वक्त कम है,
पूरा जोर लगा दो ..
कुछ को मैं जगाता हुँ,
कुछ को तुम जगा दो...
पूरा जोर लगा दो ..
कुछ को मैं जगाता हुँ,
कुछ को तुम जगा दो...
निस्वार्थ भाव से "देते रहने की ताकत"
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क्या पहाड़ किसी व्यक्ति, पशु, पक्षी को अपने पास आने से रोकता है ? नहीं
क्या चिड़िया किसी व्यक्ति के घर, पशु, पक्षी पर बैठने से पहले सोचती है ? नहीं
क्या गाय दूध देने के बाद दूध पीने वाले व्यक्ति, पशु, पक्षी को देखती है ? नहीं
क्या धरती ये देखती है कि कौन व्यक्ति, पशु, पक्षी उस पर पैदा हुई फसल खा रहा है ? नहीं
क्या चिड़िया किसी व्यक्ति के घर, पशु, पक्षी पर बैठने से पहले सोचती है ? नहीं
क्या गाय दूध देने के बाद दूध पीने वाले व्यक्ति, पशु, पक्षी को देखती है ? नहीं
क्या धरती ये देखती है कि कौन व्यक्ति, पशु, पक्षी उस पर पैदा हुई फसल खा रहा है ? नहीं
प्रश्न ये उठता है - तो फिर हम इंसान कैसे और क्योँ अपना ज्ञान, पैसा, स्टेटस देखकर काम करते हैं ?
- क्या सूर्य ने अपनी रौशनी देने में, नदी ने अपना पानी देने में, पेड़ ने अपना ओक्सिजन देने में, पहाड़ ने किसी को अपने पास आने में, चिड़िया को कहीं बैठने में, गाय को दूध देने में या धरती को फसल उगाने में कभी घमंड हुआ ? नहीं,
प्रश्न ये उठता है - तो फिर हम इंसानों में कोई भी काम करने के एकदम बाद घमंड क्योँ आ जाता है ?
- तभी तो मित्रों क्या हम सूर्य, नदी, पेड़, पहाड़, पशु, पक्षी, धरती, प्रकृति की अन्य चीजों को पसंद नहीं करते। हम सबके सब इनसे प्यार करते हैं, इनको देख देख कर आनंदित होते रहते हैं.
मित्रों पृथ्वी में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो प्रकृति के ज्यादा से ज्यादा नजदीक न रहना चाहता हो, पर रोजगार और अपने परिवार के भरण पोषण की वजह से हम इन सबसे दूर हो जाते हैं, पर फिर से सोचिये, हमें जैसे ही, जब जब मौका मिलता है हम कोशिश में रहते हैं कि इनके नजदीक जाएँ।
मित्रों पृथ्वी में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो प्रकृति के ज्यादा से ज्यादा नजदीक न रहना चाहता हो, पर रोजगार और अपने परिवार के भरण पोषण की वजह से हम इन सबसे दूर हो जाते हैं, पर फिर से सोचिये, हमें जैसे ही, जब जब मौका मिलता है हम कोशिश में रहते हैं कि इनके नजदीक जाएँ।
- क्या कभी हमने सोचा है कि हम प्रकृति कि इन सब चीजों के नजदीक क्योँ रहना चाहते हैं ?
- जी हाँ क्योँकि "हम इंसानों का मूल स्वभाव भी प्रकृति की तरह "देने का", जी हाँ देने का ही होता है", तभी तो प्रकृति की चीजें देखकर हम उनकी ओर खिंचे चले आते हैं..
मित्रों सोचिये कहीं हम अपने मूल स्वाभाव के against में तो काम नहीं कर रहे हैं ?
हम इंसानों की एक ही समस्या है -
"हमारे पास ज्ञान है - पर कोई हमें पूछ क्योँ नहीं रहा "
"हमारे पास पैसा है - पर कोई हमें पूछ क्योँ नहीं रहा "
"हमारे पास स्टेटस है - पर कोई हमें पूछ क्योँ नहीं रहा "
हम इंसानों की एक ही समस्या है -
"हमारे पास ज्ञान है - पर कोई हमें पूछ क्योँ नहीं रहा "
"हमारे पास पैसा है - पर कोई हमें पूछ क्योँ नहीं रहा "
"हमारे पास स्टेटस है - पर कोई हमें पूछ क्योँ नहीं रहा "
मित्रों कोई क्योँ पूछे हमें ? इन्टरनेट में ज्ञान भरा हुआ है, पैसे दिखाने वाले हमारे लिए कुछ कर नहीं रहे, लोन ले कर स्टेटस बन जाता है, फिर कोई क्योँ पूछे हमें ???
मित्रों हम इंसान, पशु, पक्षी हर उस व्यक्ति की तरफ आकर्षित होते हैं जो सूर्य, नदी, पेड़, पहाड़, पशु, पक्षी, धरती, प्रकृति की तरह अपने पास सब कुछ होते हुए कभी भी घमंड नहीं करते, जैसे :
पैसा हो पर घमंड न हो, ज्ञान हो पर हमेशा स्टूडेंट बनकर रहें, स्टेटस हो पर हर वक़्त जमीन से जुड़े रहे, खुले मन नम्र सुशील व अच्छे व्यवहार से पेश आये, अपने अंदर मौजूद समस्त गुणों से दूसरों को लाभान्वित करें, दूसरों से मुस्करा कर एवं प्रेमपूर्ण ढंग से बात करे और सबसे बड़ी बात सामाजिक हो (क्योँकि सामाजिक होने से आपस में मिल जुल कर आधी से ज्यादा समस्याएँ वैसे ही समाप्त हो जाती है).
मित्रों हम इंसान, पशु, पक्षी हर उस व्यक्ति की तरफ आकर्षित होते हैं जो सूर्य, नदी, पेड़, पहाड़, पशु, पक्षी, धरती, प्रकृति की तरह अपने पास सब कुछ होते हुए कभी भी घमंड नहीं करते, जैसे :
पैसा हो पर घमंड न हो, ज्ञान हो पर हमेशा स्टूडेंट बनकर रहें, स्टेटस हो पर हर वक़्त जमीन से जुड़े रहे, खुले मन नम्र सुशील व अच्छे व्यवहार से पेश आये, अपने अंदर मौजूद समस्त गुणों से दूसरों को लाभान्वित करें, दूसरों से मुस्करा कर एवं प्रेमपूर्ण ढंग से बात करे और सबसे बड़ी बात सामाजिक हो (क्योँकि सामाजिक होने से आपस में मिल जुल कर आधी से ज्यादा समस्याएँ वैसे ही समाप्त हो जाती है).
बस यहाँ पर हमेशा ये बात याद रखें :-
(1) हम इंसान सिर्फ और सिर्फ उनको पूछते और पूजते हैं जो निस्वार्थ कुछ "देते" हैं जैसे कि सूर्य, नदी, पेड़, पहाड़, पशु, पक्षी, धरती और प्रकृति।
(2) इसी तरह हम उन्ही इंसानों को पूछते, पूजते हैं "जो दुनिया को निस्वार्थ भाव से सिर्फ और सिर्फ देते रहते हैं, बिना किसी उम्मीद के".
(1) हम इंसान सिर्फ और सिर्फ उनको पूछते और पूजते हैं जो निस्वार्थ कुछ "देते" हैं जैसे कि सूर्य, नदी, पेड़, पहाड़, पशु, पक्षी, धरती और प्रकृति।
(2) इसी तरह हम उन्ही इंसानों को पूछते, पूजते हैं "जो दुनिया को निस्वार्थ भाव से सिर्फ और सिर्फ देते रहते हैं, बिना किसी उम्मीद के".
वीर सिंह सिकरवार जी की कुछ पंक्तियाँ हमें इस पथ पर चलने में बहुत ही मददगार साबित होंगी, ऐसा हमारा मानना है :-
मुश्किल है राहें पर चलना तो होगा,
गिरता हूँ बेशक संभलना तो होगा।
गिरता हूँ बेशक संभलना तो होगा।
चाहत है कंचन से कुंदन बनूँ अब,
नाजुक बदन को पिघलना तो होगा।
नाजुक बदन को पिघलना तो होगा।
सूरज सा चमकूँ ख्वाहिश है मेरी,
आग के साये में पलना तो होगा।
आग के साये में पलना तो होगा।
तख्तो के सुख की भी चाहत मुझे है,
फकीरी में जीवन को ढलना तो होगा।
फकीरी में जीवन को ढलना तो होगा।
फूलों की बगिया पुकारें है मुझको,
काँटों के वन से निकलना तो होगा।
काँटों के वन से निकलना तो होगा।
"अमृत सफलता" का पीने का मन है,
वीर "हलाहल" निगलना तो होगा।
वीर "हलाहल" निगलना तो होगा।
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