Saturday, 6 October 2018

दिखाने के लिए हारने की ताकत

"छोटा बनके रहोगे तो मिलेगी हर बड़ी रहमत,
वर्ना बड़ा होने पर तो माँ भी गोद से उतार देती है.

"दिखाने के लिए हारने की ताकत"
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जब हमारा बच्चा छोटा होता है, तो क्या हम खेल खेल में उससे जानबूझकर हारते नहीं हैं ? ऐसा क्योँ. क्या कभी सोचा है हमने.
सोचिये, हम दिखाने के लिए क्योँ हारते हैं. जी हाँ, हम अपने बच्चे के चेहरे में ख़ुशी देखना चाहते हैं. पर वह बच्चा इस जीत को अपनी सचमुच की जीत मान लेता है और अपने दोस्तों, दूसरे घरवालों, रिस्तेदारों के आगे बार बार बोलता रहता है कि मैंने अपने पापा को हरा दिया, तब सभी लोग उस बच्चे के आगे यह बोलते हैं कि "वाह तूमने तो अपने पापा को भी हरा दिया" और उस वक़्त उस बच्चे के चेहरे पर ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं होता.
मित्रों यहाँ तीन प्रश्न उठते हैं :-
1. क्या असल में ऐसा ही हुआ था, क्या वो बच्चा वाकई में जीता था ? नहीं.
2. क्या उसके पापा ने उसे खुश देखने के लिए अपने को जानबूझकर हरवाया था ? जी हाँ, बिलकुल.
3. क्या दुनिया ने माना होगा कि उस बच्चे ने अपने पापा को हराया ? बिलकुल नहीं माना होगा.
मित्रों तीसरा प्रश्न महत्वपूर्ण है :-
जी हाँ, दुनिया बहुत समझदार है, दुनिया को सब पता है कि इस बच्चे के पिता, जानबूझकर अपने बच्चे को खुश देखने के लिए हारे हैं, न कि सचमुच.
मित्रों अब आते हैं अपनी महत्वपूर्ण बात पर :-
आज की तारीख में हम इंसान इस दुनिया की सबसे बड़ी लड़ाई से लड़ रहे है और वो है :-
"मैं" की लड़ाई यानि "अहंकार" की लड़ाई.
कोई भी रिश्ता उठाइये, दोस्त का, पति-पत्नी का, employer-employee का, बच्चों के साथ माता-पिता का, गुरु-शिष्य का, चाचा, ताऊ, मामा, बुआ, अंकल, हम नाम तो लें, कोई भी रिश्ता इससे अछूता नहीं है.
मित्रों इन सभी रिश्तों में फिर से एक ही लड़ाई है, किसी भी बात पर कौन जीतेगा. एक रिसर्च के अनुसार दुनिया में सिर्फ 0.01% लोग "सिर्फ दिखाने के लिए हारने की ताकत" को जानते हैं और दूसरे इसको अपनी जीत मान कर शेखियां मारते रहते हैं. 
मित्रों, एक छोटे से उदाहरण को लेते हैं, मेरी अपने सामने वाले (मित्रों सामने वाला कोई भी हो सकता है, मेरी पत्नी, माता, पिता, भाई, बहन, अड़ोसी, पड़ोसी, रिस्तेदार, दोस्त, employer, employee इत्यादि) के साथ किसी बात पर बहस हो गई और हम दोनों में से कोई भी चुप होने को तैयार नहीं. थोड़ी देर के बाद, हम दोनों को सही गलत बात का पता होने के बावजूद, जब मेरे सामने वाले दूसरे इंसान ने एकदम चुप हो कर बहस बंद कर दी, तो मित्रों वह (सामने वाला) उन 0.01% में से हो गया जो "दिखाने के लिए हारने की ताकत" को जानता है.
ऐसा नहीं कि सामने वाला व्यक्ति और लंबी बहस नहीं कर सकता था, पर वो मुझसे ज्यादा समझदार और mature था इसलिए वो इस बहस को और आगे नहीं ले जाना चाहता.(ये बात ज्यादा महत्वपूर्ण है, ये बात हमेशा ध्यान रखियेगा)
इस बीच मैंने सारी दुनिया में ये बोलना शुरू कर दिया कि आज मैंने उस व्यक्ति से अपनी बात मनवाकर ही दिखाई. मित्रों क्या दुनिया ने माना, जी नहीं, दुनिया समझदार है. उसने तो सिर्फ और सिर्फ मेरे सामने मेरी बोली गई बातों में सिर्फ हाँ में हाँ मिलाई और कुछ नहीं. सोचिये कोई भी आकर जब हमें यह कहता है कि मैंने तो उसको मजा चखा दिया तो क्या हम मान लेते हैं, जी नहीं.
इसी प्रकार मित्रों, सोचिये जब हम एकदम से दूसरों की बातों पर विश्वास नहीं करते, तो, दूसरे क्योँ  हमारी जूठी शेखी बघारते पर, हमारी बातों में, हां में हाँ मिलाने के बावजूद हमारी बातों पर विश्वास करें क्योँकि ध्यान रहे, "ये पब्लिक है, सब जानती है", हम किसी भी हाल में किसी गलत फहमी का शिकार न हों.                                    
मित्रों हमेशा ध्यान रहे "-
1. "हारना वहां जरुरी होता है जहाँ हमें रिश्तों की कद्र होती है."
2. "हारना वहां जरुरी होता है जहाँ हम दूसरों के चेहरे में ख़ुशी देखना चाहते हैं."
3. "हारना वहां जरुरी होता है जहाँ हम दूसरों को बढ़ता हुआ देखना चाहते हैं."
और 
4. "हारना वहां जरुरी हो जाता है, जब लड़ाई "अपनों" से हो."  
किसी ने बिलकुल सही कहा है :-
जब भी अपनी शख्शियत पर अहंकार हो, तो एक फेरा शमशान का जरुर लगा लेना.
जब भी अपने परमात्मा से प्यार हो, तो किसी भूखे को अपने हाथों से खिला देना.
जब भी अपनी ताक़त पर गुरुर हो, तो एक फेरा वृद्धा आश्रम का लगा लेना.
क्योँकि :-
"छोटा बनके रहोगे तो मिलेगी "हर बड़ी रहमत",
वर्ना बड़ा होने पर तो माँ भी गोद से उतार देती है."

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